कविता कब होती है
*कविता कब होती है* कभी किनारे पर बैठ कर, जब साँझ अलविदा कहने को हो, आपने देखा है कि लहरें रेत पर एक खोई हुई प्रेयसी की तरह बार बार क्या लिखती व मिटाती रहती हैं । क्या डाल पर बैठे पंछी अपने कलरव से प्रकृति का भान कराते हैं या ऊपर बैठ कुछ बता रहे हैं जो विज्ञान ने हमारी आंखें खोल समझने योग्य नहीं छोड़ा। तारों पर दौड़ती बारिश की बूंदें क्या बच्चों जैसे एक ही स्थान पर कूदने की कोशिश करती हैं। औऱ सूरज भीरु सा धीरे धीरे समंदर के तले से निकल पहाड़ों के पीछे छुपते छुपाते आसमान में आता है। पत्तों पर लिखीं सभी इबारतें पढ़ता है और उस दिन का फ़ैसला बड़ी संजीदगी से करना तय करता है पर बहुत लंबी फ़ेहरिस्त है काम की औऱ पूरा एक दिन भी नहीं उसके पास सबको इंसाफ़ कैसे दे पायेगा जबकि बक़ाया मामलों में अभी सुनवाई भी नहीं शुरु हुई । मामले ऐसे ही मुंतवी होते रहते हैं। क्या कर सकता है सूरज ऐसे हालात में क्यूँ दिनभर का थका हारा सूरज किस से मिलने के लिए इतना बेताब होने लगता है कि जल्दबाज़ी में वह अपना कुछ सोना समन्दर में पिघला हुआ छोड़ कर रोज़ उससे मिलने की फ़िराक़ में रहता है? ये हवायें जो ख़ुशबू लिए खेतों औऱ जंगलो...